रात पूर्णिमा प्रिया तुम्हारी

 रात का राजा चाँद 


ये रात पूर्णिमा , प्रिया तुम्हारी 

जुगनू उन्मादित मदहोश सारी 

टिमटिम तारे पलके झपकाए 

घुंघराले बादल यौवन झलकाए

प्रकृति विलक्षण रूप बनाएं

तब रात का राजा चाँद आए 


जब फूल अपना रंग बिखेरे 

धरा सजाने की एक आस में 

चकोर विरह में व्याकुल दिखे 

प्रति क्षण शशि दर्शन प्रयास में 

जब शीतल वसुधा मोती बिखेरे

तब रात का राजा चाँद आए 


जब गले की माला कमल बने 

और कोयल बनी है काजल

जब मधुर संगीत तान सुनाती 

शीतल झरनों का हलचल 

जब जगत चराचर मुस्काए

तब रात का राजा चाँद आए


जब मचलती है चांदनी आकाश में

जब मखमली सर्दीली हो रात में

शहद सी शरद लगे श्वेत उजास में 

आम की मंजरी खिले मधुमास में 

जब चंचल चांदनी भी शर्माए

तब रात का राजा चाँद आए

●●●●दुष्यंतकुमार वर्मा 'निराला'✍️●●●●

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