वृक्षारोपण हमारा कर्तव्य
वृक्षारोपण
दुष्यंतकुमार वर्मा (शिक्षक)
यदि पौधे नहीं लगाओगे तो, जीवन कैसे पाओगे
यदि धरा नहीं सजाओगे तो, जल कहां से लाओगे
वृक्ष नहीं तो जल नहीं, जल बिना मर जाओगे
समय पे समझ ना पाये तो, जीवन भर पछताओगे
नहीं चहकते गाँवों में पंछी ,आसमान भी खाली है
रोको यह विनाश का खेल अब, धरती मां भी हारी है
सूख रही है नदिया अब, कैसा मंजर हो रहा
तापमान बढ़ बढ़ रहा है भाई, धरा भी बंजर हो रहा
सिर्फ आडंबर दिखाओगे तो, धरा कैसे बचाओगे
आम नागरिक या हो नेता,कमी नहीं है नारों में
वृक्षारोपण के नाम पर, आडंबर बाजारों में
फोटो शान दिखाने खातिर,छपवाए अखबारों में
स्वार्थ संकीर्णता और लालच की, कमी नहीं मक्कारो के
वन नहीं तो वसुधा नहीं, क्या विनाश को रोक पाओगे
किसे है चिंता वन की देखो, आग सभी लगा रहे
मानव ही बन गया है दानव, जंगल को भी खा रहे
एक वृक्ष सौ पुत्र समान ,बातों में बस रह गया
वृक्ष लगाना देव सामान, नारों में बस कह गया
धरती मां की कोख उजाड़ तुम, सांस कहां से पाओगे
ओज भरा आवाहन मेरा ,हरित क्रांति आगाज करो
नर-नारी और बच्चे बूढ़े ,सब मिलकर हुंकार करो
धरती मां के आंचल में ,हरियाली विस्तार करो
शुभ कार्य प्रारंभ करो ,शंखनाद आरंभ करो
प्रकृति नहीं बचाओगे, दंड अवश्य तुम पाओगे
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