फैशन एक कलंक
🙏नारी -जीवन वर्तमान दौर 🙏
**************************---✍दुष्यंत कुमार वर्मा 'सजल'✍---
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*फैशन की गुड़िया सी बनकर*
* कितना सम्मान पायी हो *
*तू श्रृंगारी बंदरिया बनकर*
*लज्जाजनक स्थान बनाई हो*

_नैतिक पतन का ना कारण बनो_
_सांस्कृतिक प्रतिभा का न मारन बनो_
_उत्तेजक भड़कीले वस्त्रों में बहनों_
_शूर्पणखा का ना उदाहरण बनो_
_भोग विलासी दासी बनकर_
_पग अंधकार में दौड़ा दिए_
_अधोगामी की कर सफर तू_
_यह कैसी आग लगा दिए_

*_शरीर सजा आकर्षक बनाकर_*
*_क्यों अपमान कराई हो_*
*_फैशन की गुड़िया से बनकर_*
_*लज्जाजनक स्थान बनाई हो*_

_व्यक्तित्व निखरता जाता है_
_सादगी और शालीनता में_
_चरित्र बिगड़ता जाता है_
_फैशन रूपी मलिनता में_
_परिवार टूटता जाता है_
_भाई भी रहता हिनता में_
_मां सोचती गलत ना हो जाए_
_पिता भी रहता चिंता में_
*_चरित्र गिराकर घाव लगाकर_*
*_कौन सी खुशी तुम पाई हो_*
*_फैशन की गुड़िया से बनकर_*
*_लज्जाजनक स्थान बनाई हो_*

_नारी आज आधुनिकता में_
_और कितनी गिर गई है_
_विज्ञापन फिल्म अश्लीलता मे_
_बेशर्मी पार कर गई है_
_वास्तविकता भूलाकर_
_ पश्चिमी अपनाकर_
_अनुचित कार्य कर रही है_
*_नायिका की रोल निभाकर_*
*_अपराधी प्रवृत्ति तुम बढ़ाई हो_*
*_फैशन की गुड़िया से बनकर_*
*_लज्जा जनक स्थान बनाई हो_*

_फैशन तेरी पॉपुलर बीमारी_
_जिसमें फंसे हर क्वालिटी के नारी_
_मैचिंग ब्लाउज तेरी मैचिंग साड़ी_
_आउट ऑफ द फैशन जारी_
_लीपे पोते चेहरे को देखो_
_लगते सभी जोकर है_
_फैशन ने मुझे आकर बताया_
_यह सभी मेरे नौकर है_
*_छोटे छोटे कपड़ों में_*
*_भारतीय संस्कृति बेच खाई हो_*
*_फैशन गुड़िया सी बनकर कर_*
*_लज्जा जनक स्थान बनाई हो_*

_अरे फिल्मकारों ,साहित्यकारों_
_तुम भी कर्णधारी इंसान हो_
_चित्रांकन ऐसा करो_
_जिसमें जननी का सम्मान हो_
_चकाचौंध को सबकुछ बताकर_
_अब बन बैठे अनजान हो_
_नारी को कलंकित करने वाले_
_कितने गंदे शैतान हो_
*_ऐसे शैतान का साथ निभाकर_*
*_अपनी ही इज्जत गँवाई हो_*
*_फैशन की गुड़िया सी बनकर_*
*_लज्जाजनक स्थान बनाई हो_*

_भविष्य में बेटी बच सकेगी_
_ढंग से कपड़ा पहनाओ_
_कुल मर्यादा ध्यान में रखेगी_
_तितलियों सी ना सजाओ_
_सादाजीवन हो सुंदर गहना_
_विपत्ति से लड़ना सिखाओ_
_भारत माता की सेवा करना_
_जीना और मरना सिखाओ_

*_दुनिया की चकाचौंध में_*
*_अपने कर्तव्य भुलाई हो_*
*_फैशन की गुड़िया सी बनकर_*
*_लज्जाजनक स्थान बनाई हो_*

_पाश्चात्य छोड़ सांस्कृतिक बनो_
_फिर देवीपद तुम्हें पाना है_
_स्नेहील प्यारी कन्यारत्न को_
_लक्ष्मी दुर्गा बनाना है_
_शारीरिक सौंदर्य बस दो दिनों का_
_आंतरिक सौंदर्य बढ़ाना है_
_तू ही देवकी तू ही जानकी_
_नया इतिहास बनाना है_
*_कदम बढ़ा कर्तव्य निभा_*
*_तू ही दुर्गावती कहाई हो_*
*_फैशन की गुड़िया सी बनकर_*
*_कितना सम्मान पाई_*

_वात्सल्य ह्रदय में स्नेहिल निर्झर_
_बहाकर देखो करुणा की धारा_
_पवित्रता संघ सेवा समर्पण_
_हो सास्वत सौंदर्य तुम्हारा_
_सजल श्रद्धा सौभाग्यवती तू_
_नवयुग की तू गहना_
_शुभभावना और शुभकामना तू_
_हंसी खुशी से रहना_
_*विश्व संस्कृति की ज्ञानदायिनी*_
_*मां शारदा कहाई हो*_
_*विश्व संस्कृति की जन्म दात्री*_
_*वसुंधरा कहलाई हो*_
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_*दुष्यंत कुमार वर्मा सजल*_
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