आदमी अब पथरा होगे
💐🙏 *आज के मनखे* 💐✍
(दुष्यंत कुमार वर्मा)-----
*कइसे पथरा होगेव मनखे*,
*का पथरा होके मरहू।*
*प्रकृति के रूप अब बिगड़गे,* ,
*अउ कतका नाश करहू।*
कतको चिरई के घोंसला उजड़गे,
कतको जीव बिन पानी के मरगे,
हमर आसरित सबो जीव मन,
विश्वासघात के बली चढ़गे।
अपन असन सबो ल समझव,
दुख अऊ दरद होथे।
हमरे असन सबो प्राणी मन,
बिलख बिलख के रोथे।
*सबो प्राणी बर दया करहू।*
*मनखे मन बर मया करहू।*
*विधाता के सुघ्घर रचना हरन ग,*
*बिधि- बिधान म चलहू।*
सब जंगल म आगी लगात हे,
गाय गरुवा सब जीव नंदात हे।
कतका पेड़ कटागे संगी,
चिरई न्ई चहचहात हे।
पानी घलो अटागे संगी,
आदमी घलो भूंजात है।
बिदेशी करम अपनाके संगी,
मनखेमन बऊरात हे।
*मन ल काबर बदल डारेव,*
*कतका जहर उगलहू।*
*सबो जगा ल बिगाड़ करेव,*
*अब कतका उजाड़ करहू।*
पूजापाठ के रीत नी जानेव,
का देवी के पूजा करथव।
धरम करम के बात नी मानेव,
काबर हिंसा करथव।
जीव जन्तु ल परसाद बनाके,
अंधबिश्वास म चलथव।
का मानही बात बता मोला,
नही,एके कारन ये डरथव।
*जब जाना हे दुनिया ले सबला,*
*अऊ कतका कुकर्म करहू।*
*हिंसा करे ले उमर नी बाढ़े,*
*ये सही बात ल धरहू।*
दुष्यंत कुमार वर्मा 'सजल',
ये कविता के रचनाकार हे।
*सबला जिनगी ले पियार हे*,
*सही नियाव ल करव*।
*मन के भरम निकाल के*,
*सच रद्दा म चलव*।
अपनपापी पेट भरेबर,
अत्याचार झन करव ।
सबे हद ल पार कर डरेव ,
भगवान ल एक्कन डरव ।
*भूल सुधार के दुनिया संवारलव,*
*मीठ मीठ बने रहहू।*
*स्वरग बन जाही ये भूइया ह,*
*सब मिलके काम करहू।।*
(दुष्यंत कुमार वर्मा 'रचनाकार')
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